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Sunday, May 17, 2020

40° तापमान में कतार में खड़ा रहना मुश्किल हुआ तो बैग को लाइन में लगाया, सुबह चार बजे से बस के लिए लाइन में लगे 1500 मजदूर

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए...


नासिक हाईवे पर खारेगांव टोल है। रविवार दोपहर यहां लगभग 1500-2000 प्रवासी मजदूरों की भीड़ है। धूप में खड़े रहना मुश्किल है इसलिए मजदूरों ने बैग को लाइन में लगा दिया।

पहली रिपोर्ट:

नासिक हाईवे पर ठाणे का यह पहला नाका है, खारेगांव टोल।दोपहर का वक्त है, यहां लगभग 1500-2000 प्रवासी मजदूरों की भीड़ है। रुद्रपुर की अंजू दो छोटे बच्चों के साथ सुबह पांच बजे से कतार में खड़ी हैं। वह कहती हैं, ‘अब निकल गए हैं तो जाएंगे तो जरूर, चाहे कैसे भी जाएं।’ प्रतापगढ़ जाने के लिए कतार में लगे संजय बताते हैं,‘बस नहीं मिली तो पैदल जाएंगे।’ जिससे भी बात करो बस घर वापसी की जिद है। इनके विश्वास के सामने लगता है कि सड़कों की लंबाई कम हो गई है।

इस जगह से महाराष्ट्र सरकार इन्हें सीमा तक छोड़ रही है, जहां से ये लोग अपने अपने राज्यों को जाएंगे। सुबह 4 बजे से लाइन में लगे थे और दोपहर के 12 बजे तक इनमें से कोई नहीं जानता था कि किसे जाने को मिलेगा और किसे नहीं। जाहिर है कि सभी नहीं जा पाएंगे।

संतोष कुमार मिस्त्री का काम किया करते थे। मुंबई के कलवा में 1500 रुपएखोली का किराया था,लेकिन दो महीने से वह किराया नहीं दे पा रहे। दुधमुंहे 9 महीने के बच्चों को लेकर लाइन में खड़े हैं। वह कहते हैं कि हमारी चाल किसी ने बताया कि यहां से बसें जा रही हैं, इसलिए हम आ गए। संतोष को पत्नी और दो बच्चों के साथ भदोई जाना है। उनकी पत्नी अपने दूसरे बच्चे को दूध पिला रही हैं।


काली साड़ी पहनेबैठीं यह महिला संतोष की पत्नी हैं। वह कहती हैं कि बच्चे छोटे हैं लेकिन हमारे हैं, चाहे जैसे हो, उन्हें ले जाएंगे।

इस नाके पर लाइन में लगे सबसे ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश के जौनपुर, भदोई और गोरखपुर के हैं। प्रतापगढ़ जाने के लिए सुबह सात बजे से लाइन में लगे संजय कहते हैं कि प्रतापगढ़ जाकर कम से कम भूखे नहीं मरेंगे। संजय ने बताया कि अगर यहां से बस नहीं मिली तो वह अपने परिवार के साथ प्रतापगढ़ तक पैदल जाएंगे।

हालांकि इनके खाने पीने की कोई दिक्कत नहीं है। लोग खाने और पीने के पानी की व्यवस्था कर रहे हैं। हर दिन खाने की व्यवस्था करने वाले शाकिर बता रहे हैं कि अभी तो बसें लगी हैं लेकिन जैसे ही शाम होगी तो लोग पैदल चलना शुरू हो जाएंगे।यहां ट्रक खड़े हो जाएंगे जो लोगों से मनमाने पैसे वसूलते हैं।

यहीं हमें तेजूराम जायसवाल, सत्यधामा और चंद्रभान मिले,जो बस से यूपी के आजमगढ़ जाने के लिए निकले हैं। तेजूराम बोले, ‘मुंबई के भांडुप में रहता हूं, आजमगढ़ घर है मेरा। काम धंधा बंद है, दो महीने तो बैठकर खाया, लेकिन अब काम फिर शुरू होने की संभावना कम है, इसलिए गांव जा रहा हूं।

‘हम लोगन के पास खाय पिय के कुछ नाय बा। यहां भूखा मरय क नौबत आय गइबा, त का करी?’ सचिन चौरसिया 40 डिग्री गर्मी और इस कड़ी धूप में जौनपुर जिले के शाहगंज जाने को निकले हैं। सचिन मुंबई के कांदिवली इलाके के एक होलसेल दुकान में काम करते थे। पर अब दुकान बंद है, तो गांव जाने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है।

टोलनाके पर ही हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के मूल निवासी मोहम्मद राजू मिले। बोले, मैंने ट्रेन से जाने के लिए यूपी और महाराष्ट्र दोनों राज्य सरकार की वेबसाइट पर फॉर्म भरा था। पर जब कहीं पर नाम नहीं आया तो बस से गांव जाने के लिए निकला हूं।

महाराष्ट्र सरकार की बसों से मध्य प्रदेश के बॉर्डर पर बड़ी संख्या में यूपी-बिहार के लोग पहुंच रहे हैं। खारेगांव डिपो पर इन लोगों के नाम की लिस्ट तैयार की जाती है। इसके बाद लोगों को एसटी की बस में बैठाकर मध्य प्रदेश के बॉर्डर तक पहुंचाया जाता है।

खारेगांव डिपो पर तैनात एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि खारेगांव नाके से 11 बसें रोजाना छोड़ी जा रही हैं। इसी प्रकार आसपास के डिपो से भी रोजाना 16 के करीब बसें छोड़ी जा रही हैं। एक बस में करीब 20-22 लोगों को बैठाया जाता है।

खारेगांव टोल नाके पर हमें सन्मान सोसाइटी के कुछ लोग मिले। ये सभी मध्यमवर्गीय मराठीभाषी परिवार से हैं। जिन्होंने 20 हजार रुपए जमा कर यूपी बिहार के लोगों को पानी, बिस्किट, पुलाव जैसी खाने के चीजें जुटाई हैं।



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If it is difficult to stand in the queue in 38 degree sunlight, then put the bag in the line, 1500 workers are engaged in the line for the bus from four o'clock in the morning.


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