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Friday, June 19, 2020

मां बोलीं- दो बार बेटे ने बात करने की कोशिश की, पर हो न सकी; 16 जून को फोन आया तो शहीद होने की खबर मिली, 21 दिन पहले उसे बेटी हुई है

'बेटे का 30 मई को जब फोन आया था, उस वक्त मैं बहूको लेकर हॉस्पिटल के लिए निकल चुकी थी। 30 मई उसकी डिलीवरी की डेट थी। बेटा मुझसे बात करना चाहता था, लेकिन मेरा फोन घर पर रह गया था तो मेरी बड़ी बहूने उठाया। उसने बेटे कोबताया कि मम्मी हॉस्पिटल गई हैं। फिर उससे मेरी उस दिन बात नहीं हो सकी। चार-पांच दिन बाद उसने फिर फोन लगाया था, लेकिन वो हैलो, हैलो बोलता रहा और फोन कट गया। बात नहीं हो पाई। इसके बाद मैंने 16 जून को सीधे फोन पर उसकी मौत की खबर सुनी।'

कुंदन साल में दो से तीन बार अपने गांव आया करते थे। जब आते थे तो 15 दिन तो रुकते ही थे।

यह कहते हुए साहेबगंज के शहीद कुंदन कुमार ओझा की मां भवानी देवी एकदम चुप हो गईं। कुछ मिनटों की खामोशी के बाद रूआंसे गले से बोलीं, 'मेरा बेटा अपनी 21 दिन की बेटी का एक बार चेहरा तक नहीं देख पाया। किसी से बात तक नहीं कर पाया। लेकिन, मुझे बेटे पर गर्व है। उसने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।'

2017 में कुंदन की शादी हुई थी। 21 दिन पहले ही बेटे हुई, लेकिन चेहरा भी देख नहीं सके।

बोलीं, 'वो जब ऊपर(लद्दाख)गया था तो जम्मू में अपने दोस्त को बोलकर गया था किघर पर फोन लगाकर बता देना कि मैं ऊपर चला गया हूं। नीचे आऊंगा तब फोन लगाऊंगा।' शहीद कुंदनके बड़े भाई मुकेश ओझा ने बताया कि भाई के शहीद होने की खबर सबसे पहले मां को ही मिली थी। 16 मई को किसी का फोन पापा के नंबर पर आया था। वो फोन मम्मी ने उठाया था। फोन पर महिला की आवाज सुनकर उन्होंने पूछा कि, 'क्या आप केके की मम्मी बोल रही हैं?इन्होंने जवाब दिया हां। तो उन्होंने कहा किएक दुखद घटना है, क्या आप बात कर पाएंगी।

यहां से जवाब मिला कि'हां जी बताइए' तो उन्होंने कहा किआपका बेटा शहीद हो गया। वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। इतना सुनते ही मां के हाथ-पैर कांपने लगे और वो रोने लगीं। उन्होंने तुरंत ये बात पापा को बताई। फिर पापा ने दोबाराउसी नंबर पर फोन किया, तब पता चला कि हमारा भाई लद्दाख में चीन की सेना से लड़ते हुए शहीद हुआ है। इसके बाद तो घर पर मातम छा गया। कुंदन के पिता रविशंकर ने यह बात तुरंत बड़े बेटे मुकेश को बताई।

शहीद कुंदन के पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए भीड़ उमड़ पड़ी।

मुकेश कहते हैं किहमारा परिवार पूरा बिखर गया और घर में भीड़ जमा हो गई। बिलखते हुए उन्होंने कहा, 'अब हमारे घर में कोई नहीं आएगा, सर। ये भीड़ बस एक ही दिन की थी, हमारा तो घर बर्बाद हो गया।' मुकेश ने बताया कि घर में कमाने वाला सिर्फ कुंदन ही था। वो महज 18 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गया था।

कुंदन 2 फरवरी को ही अपने गांव से दोबारा ड्यूटी पर लौटे थे। वे बड़े भाई से रोज बात करते थे।

जब वैकेंसी निकली थी तो उसके साथ में ही गया था। मेरे सामने ही वो दौड़ जीता था। फिटनेस में पास हुआ था। 2011 में वो ड्यूटी पर चला गया। हर साल दो से तीन बार आता था। कभी पंद्रह दिन तो कभी महीनेभर रुकता था। हम दोनों भाई हर रोज ही बात किया करते थे, लेकिन जब से उसकी ड्यूटी ऊपर घाटी पर लगी थी, तब से बात बंद हो गई थी, क्योंकि वहां उसका फोन नेटवर्क में ही नहीं होता था।

शहीद कुंदन की अंतिम यात्रा में शामिल सेना के जवान और लोग।

मुकेश ने बताया कि, कुंदन ने पहले ही बोलकर रखा था कि बेटी हुई तो उसका नाम दीक्षा रखेंगे। इसलिए हमने बच्ची का नाम दीक्षा ही रखा है। मुकेश के मुताबिक, घर में आय का एकमात्र सोर्स कुंदनकी तनख्वाह ही थी। एक-दो बीघा जमीन है। उस पर इतना अनाजहो जाता है कि अपने खाने को हो जाए। कई बार वो भी नहीं हो पाता। कुंदन के परिवार को अभी तक सरकार की तरफ से कोई सहायता की जानकारी नहीं मिली है। परिवार बेटे के जाने से दुखी है,लेकिन उसकी बहादुरी पर गर्व कर रहा है।

अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि देते पिता।


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देश के लिए जान न्योछावर करने वाले शहीद कुंदन कुमार घर में इकलौते कमाने वाले थे


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